Woh nib wale pen - Mamta Sharma

''वो निब्वाले पेन''
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अचानक मुझे याद आये हैं वो दिन जब चलते थे निब वाले पेन !


मैं रोज ही घिसती थी स्याही से लिखती थी,
पेन की स्याही के धब्बे मैं गिनती थी।

वो झगडे जो छोटी सी निब से ही होते थे,
वो लम्हे जब हम एक निब को भी रोते थे।

वो दिन जब परीक्षा में स्याही ना होती थी,
वो दिन जब हमारी लड़ाई ना होती थी।

वो बचपन के दिन जब थीं दोपहर लम्बी,
वो दिन जब सहेली की चोटी  ही लम्बी।

वो दिन जब कभी हम छीन के खाते थे,
झड बेरी के बेर या कटारे चुराते थे।

वो दिन जब सखी से जो बातें थीं होती,
कभी भी समय कम था, जो रातें भी होतीं।

हम संग ही बिताते ये पूरी ही जिन्दगी,
कहाँ है वो मेरी पुरानी सी जिन्दगी।

जब कुछ ही रुपये मुझ को लगते थे ज्यादा,
जब थोड़े में भी था मस्ती से गुजारा।

मुझे ला के दो ना एक बार कोई यारों,

निब वाले वो धब्बे फिर से मुझ पे डालो।

- ममता शर्मा

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