Dharm se shikayat - Niraj Kumar "Neer"

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धर्म से शिकायत
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क्या खाने को चखा
खाने की शिकायत करने से पहले?
क्या परखा उसके गुण दोषों को या
यूँ  हीं चाँद टेढ़ा कर लिया ?
ये आदत है तुम्हारी,
अबाध स्वतंत्रता से उपजी
एक बुरी आदत .
लंबी गुलामी का असर हो गया है
तुम्हारे मस्तिष्क पर.
तुम किनारे पर बैठ
समुन्दर को छिछला बताते हो .
किनारे पर जमा गन्दगी को देख
सागर की प्रकृति बताते हो.
ये गन्दगी सागर का दोष नहीं
यह दोष है तुम्हारा.
जो समझते हैं स्वयं को ज्ञानी
अपने सीमित ज्ञान के साथ.
क्या पन्ने पलटे उपनिषद , गीता के कभी
कभी कोशिश की तत्व जानने की.
चार पन्ने की कोई किताब पढ़ी और
सबको झूठा कह दिया.
तुम क्यों नहीं तलाशते कोई और सागर,
लेकिन वहाँ आज़ादी नहीं ||

- नीरज कुमार "नीर "
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