Jeevan Mantra - Ajay Tiwary

 जीवन-मंत्र
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उच्चाकांक्षाओँ के बोझ तले
मैं निस्पंदित मृतप्राय हुआ,
बुलंदियों की होड़ा-होड़ी में
मानव से जैसे मशीन हुआ।

        सुरसा के मुख सी बढ़तीं
        मेरी इच्छाओं  का अंत  नहीं,
        भोग-विलास की पृथ्वी पर
        कोई साईं सरीखा सन्त नहीं।

कालचक्र के व्यूह में  मेरा
भूत भविष्य को खींच रहा,
अग्रगति में अवरोध अतीत
निर्मम हाथों में भींच रहा|

        मंज़िल आँखों से ओझल
        भटका  पंथी डग  भूल रहा,
        मरीचिका  को लक्ष्य किये
        प्यासा ज्यों जल को ढूंढ रहा।

इच्छित कस्तूरी नाभि में उसकी
पर घन-वन में खोज रहा,
अज्ञानी, भ्रमित यह मृग
क्यों  खुद  को नहीं टटोल रहा?

        यदि व्यर्थ खनिज-धातु का ढेला
        अग्निस्नान कर स्वर्ण हुआ,
        तो लू, अंधड़, धूप को मैं  भी
        सह  करके आज मनुष्य हुआ।

लालसाओं को तज कर अब
आज हठात मैं स्वतंत्र हुआ,
गीता का  उपदेश ही  जैसे
आज  अचानक  मंत्र हुआ।

        फल  की  चिन्ता  थी  दुश्चिन्ता
        कर्मयोग  से  ध्यान हटा था,
        क्यों स्वर्थपर जीवन जीता था
        क्यों कृष्ण से अपना ध्यान बंटा था?

सफलता की परिभाषा अब बदली
बदले इसके मानदण्ड,
जीने का  कारण अब मिला
रह गया न कोई अंतर्द्वंद।

        पहले सफलता के पीछे मैं भागूं
        अब सफलता मेरे पीछे है,
        पहले जय में  भी पराजय
        अब  पराजय में  भी जय है।


                                                - अजय तिवारी
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2 comments:

Papori said...

A great poem.superb use of words and rhythm.has great understanding of life,its impermanence and superficiality.Its refreshing and gives mul-mantra.

Narayan Kumar said...

उद्देश्यपूर्ण, अति सुंदर, लयात्मकता से परिपूर्ण, भावों और विचारों की ऐसी प्रधानता देखने को आजकल कम मिलती है| लिखते रहिए|

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