Mera anokha ghoda - Mamta Sharma

मेरा अनोखा घोड़ा
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मैं चढ़ी किताब के घोड़े पे ,
तब पंख फैलाए भगोड़े  ने

ले चली मुझे एक नई तरफ ,
जिसमें थे सत्य के छिपे हरफ

कहीं शून्य कहीं प्राचीन इतिहास ,
कहीं काव्य कहीं साहित्य के साज़

कहीं उड़े पंछी ,कहीं भागे हिरन
कहीं दूर आकाश से झरी किरण ,

कभी सूर्य चन्द्र उल्काएं मिलीं ,
कभी तेज पवन हो मस्त चली ,

कभी बच्चे शोर मचाते मिले ,
तो बूढ़े सस्वर गाते चले ,

कभी मिली प्रजातियों की पहचान ,
कभी जल कभी हिम कभी मिले प्रपात,

कभी उद्गम किसी नदिया का मिला ,
कभी संगम किसी सागर से मिला ,

कभी मिले महर्षि बड़े बड़े ,
 हुए शिष्य भी जिनके बहुत बड़े,

मुझे मिले कई प्रेरक प्रसंग ,
जिनमें बसते थे आज के रंग,

एक जगह मिले बापू थे खड़े ,
और पास मैं ही डाकू थे खड़े ,

 मिला ज्ञान जिसे समझी ही नहीं,
 मिल भान जिसे भूली ही नहीं ,

कभी मिले कई अपने से लोग ,
लिए मानवता के गुण हर प्रति और ,

कभी कडवी कुछ सच्चाई थी ,
हर सूं फैली सी लड़ाई थी

किसी युद्धकी भीषण आग मिली
कहीं शांति की सेन्यअपार मिली

कभी दुःख सुख की ललकार भी थी ,
कल आज की कहीं तकरार भी थी ,

उत्तर दक्षिण पश्चिम पूरब ,
मुझे प्यारा ये घोडा हरदम ,

सब मिल सकता इस घोड़े संग
मैं हर पल चाहूँ इसका संग

~~ ममता शर्मा ~~
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