Ek Ajnabi Raat - Sushil Kumar Singh

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 एक अजनबी रात
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तकियों से लिपटी हुयी एक अजनबी रात,
कुछ ऐसे बीती, उनकी ठंढी सी मुलाकात,


जाने कहा से वो, सूरज ढलते ही आये थे,

तलासु मै चैन, वो बेचैनी का सेज लाये थे,


पलकों से उठ कर जब नज़ारे देखती,

वही कोने में मिटी-2 सी नीद रह जाती,


आँखों के किनारों पे सपने हजार थे,

पर उनकी एक झलक ही बाकि थी,


कहे "अकेला" इस रात अकेला नहीं था,

कुछ चटपटे लम्हों से घिर सा गया था,


फिर हांथो पे अपने सर को ठहराए,

दिल के पीछे धड़कन को छिपाए,


एक टक-टकी सी लगी थी दरवाजो पे,

उनकी हल्की-2 छनकती पाजो पे,


तभी झरोखों से कट के आती ठंढी हवा,

 जैसे उनका ही अहशास हो रहा हो,


यारो सरे बाज़ार उनका नाम न पूछना,

मेरी मोहब्बत का कभी एहशान न पूछना,


कहू कहानी क्या उस अजनबी रात की,

सुनो मेरी जबानी उस मुलाकात की,


तकियों से लिपटी हुयी एक अजनबी रात,

कुछ ऐसे बीती, उनकी ठंढी सी मुलाकात

~~ सुशील कुमार सिंह ~~ 

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