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|| आपकी सेवा में देश के प्रतिष्ठित कवियों द्वारा रचित चुनिंदा हिन्दी कविताओ का अनूठा संकलन ||
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Friday, April 8, 2011

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Uljhe Uljhe Se Sawaal - Puneet Jain

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उलझे उलझे से सवाल - पुनीत जैन

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उलझे उलझे से कुछ अनकहे से सवाल है मेरे
बचपन से जो मेरे दिल में पलते रहते है
पहले भी अक्सर में खुदसे पूछा करती थी
जवाब कभी नहीं मुझे मगर मिल पाते थे ..??

माता पिता की में लाडली रही दिल की रानी बनी रही
हर पल उनके प्यार के छाव में ही तो में पली
भैया बड़ा शरारती था सताता रहता था सबको
लेकिन फिर भी क्यू उसको कभी किसी की डांट नहीं पड़ी .??

रात रात भर बहार घूमता दोस्तों संग बतियाता
मोबाइल के बिल से उसके पापा का सर घूम जाता
लेकिन मेरे सिर्फ महीने में एक बार पिक्चर चले जाने से
फ़िज़ूल खर्ची कैसे हो जाती… ये में कभी समझ नहीं पाती..??

भैया तो जो चाहे खाए उसकी पसंद का बने सब कुछ
मुझे सब्जी न भाये तो क्यू मुझे ससुराल में मुश्किल होगी
भैया तो था पढाई में दब्बू फिर भी उसको थे मिलते गिफ्ट
में तो हर बार ही अव्वल आती फिर भी क्यू कभी शाबाशी मिली नहीं .??

मेरा भी दिल करता में भी पढू और सिखु कुछ अलग
लेकिन कह दिया गया तेरी शादी में करेंगे सब खर्च
भैया की इच्छा न थी फिर भी उसे भेजा पढने लन्दन
उसकी इस नाकामी पे भी दोष मेरी कुंडली में ही आया नज़र..??

भाई पे भारी है ये कहके मुझे हमेशा ताना दिया
दादी ने न कभी मुझे भैया जितना एक बार भी स्नेह दिया
दादा जी ही थे जो मुझे चाहते थे, करते थे वो मेरी बड़ाई
लेकिन यहाँ भी दादी मेरी उनको कहती न बिगाड़ो इसे

आखिर तो ये अपनी नहीं, है ये तो हमेशा से पराई है ..!!
जाना है इसे दूजे घर और सिखने है उनके रीति रिवाज़
रहने दो इसे ऐसे ही न चढ़ाव इसे अपने सर पे सरकार
पर उस पल तो में थी न उनकी अपनी.. छोटी सी नन्ही सी जान
फिर क्यू शादी के पहले ही पराया कर दिया था तुमने मुझे माँ..??

ये ही कुछ सवाल है मेरे मन में जो कई सालो से उठते है
नहीं इनका मतलब कोइ पर फिर भी दिल में बहुत ये चुभते है
कोई न दे सकेगा इन् सवालों का मुझको जवाब ये जानती हु में
फिर भी माता - पिता से एक बार पूछना चाहती हु में....
क्यू हु में आपके लिए पराई जब आपके ही खून से बनी हु में …????

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